सोमवार, 8 नवंबर 2010

भारत का दिल जीत लिया ओबामा ने

          अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने अपनी भारत यात्रा को अनेक मामलों में यादगार बना दिया. उन्होंने भारतीयों का दिल जीत लिया. उनके भाषण में उनके दिल की बात थी जो भारत के दिल तक पहुंची. जिस महात्मा गाँधी को, जिस नेहरू को, हर दिन भारत के ही  साम्प्रदाइक  तत्वों द्वारा मनगढ़ंत इतिहास और झूठ के पुलिंदों के साथ आलोचना का शिकार बनाया जाता रहा है, उसी देश में ओबामा आते हैं और कह जाते हैं कि, अगर महात्मा गाँधी न होते तो मैं अमेरिका का राष्ट्रपति नहीं होता. उन्होंने पकिस्तान में आतंकी गढ़ों को ध्वस्त करने की भी बात बड़ी साफगोई से की. उसने संसद में स्वामी विवेकानंद और डा. अम्बेदकर को स्मरण करते हुए हमारे देश के हर कोने की आबादी  पर भी सटीक बात की.       
         ओबामा ने न सिर्फ भारत को बल्कि पूरे विश्व को एक प्रभावपूर्ण  सन्देश दिया कि वह भारत के साथ उस हर संघर्ष में शामिल है जो जनतंत्र के हित से प्रेरित है. अमेरिका भारत के साथ आतंकवाद की समाप्ति के संघर्ष में भी शामिल है और ओबामा ने संसद में अपने भाषण का समापन 'जय हिंद' के बुलंद  नारे के साथ किया.
         यह तो सभी जानते हैं कि ओबामा एक कुशल वक्ता हैं, लेकिन उनके भाषण में सच्चाई घुली हुई थी और इस सच्चाई के पीछे स्पष्ट कारण हैं, भारत की आर्थिक  प्रगति, इसका एक वैश्विक शक्ति के रूप में उभरना,  भारत की क्रय शक्ति का प्रभावी हो जाना और सामरिक रूप से भारत का एक महत्वपूर्ण राष्ट्र के रूप में विकसित होना आदि.
           अमेरिका भारत को आज एक बड़े बाजार के रूप में देख रहा है, लेकिन भारत की ऎसी स्थिति की कल्पना भी कभी अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपतियों ने नहीं की होंगी. अगर अमेरिका को अपनी आर्थिक स्थिति को पुन: ठीक-ठाक करना है, तो उसे भारत के साथ-साथ  विश्व के अन्य देशों से भी  व्यापार बढ़ाना ही होगा. 
            भारत की इस प्रभावी  स्थिति को बनाने का  काम, 'करने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह' ने किया और ओबामा ने उनके योगदान को  आकलित कर दिया, और  उनको  वह मुकाम मिल गया, जिसके लिए उन्होंने रात दिन, आलोचनाओं की बिना परवाह किये, मेहनत की और भारत को  एक ठोस आर्थिक आधार प्रदान किया.
             अनेक बार देश के वरिष्ठ नेताओं ने मनमोहन सिंह को महंगाई सिंह के नाम से पुकारते हुए उनकी तौहीन की, लेकिन किसी का सच्चा और सही काम छिप नहीं सकता है. 
              ओबामा  ने भारत के साथ बराबरी की बात की. लेकिन इसके पहले जब भी कोई  अमेरिकी राष्ट्रपति आते थे तो भारत उनसे आर्थिक सहयोग की कमाना करता था, लेकिन इस बार तो लेन-देन बराबरी के आधार करने की बात ओबामा ने की और भारत को एक वैश्विक शक्ति के रूप में भी मान्यता दे दी.
            नेहरू ने जिस आधुनिक भारत का सपना देखा था, उसे मनमोहन सिंह ने शायद पूरा करने की जिम्मेदारी ले ली है. नेहरू के समय देश आर्थिक विपन्नता से जूझ रहा था. देश में आधारभूत संरचना की कमी थी, फिर भी नेहरू ने अपने बलबूते देश को अनेक बड़े उद्योग दिए और परमाणु के क्षेत्र में भारत को एक शक्ति बनाने के लिए कदम बढ़ाया.
         ओबामा  ने नेहरू के पंचतंत्र के सिद्धांत को भी याद किया. और चीन का बिना नाम लिए कह दिया की अमेरिका और भारत को उस हर देश में लोकतंत्र को मजबूत करने की जरूरत है, जहाँ लोकतंत्र नहीं है और जहां मानवीय मूल्यों का ह्रास हो रहा है. उन्होंने चीन के द्वारा भारत को १९६४ में  दिए गए धोखे की चर्चा तो नहीं की, लेकिन यह कह कर कि अमेरिका भारत को कभी धोखा नहीं देगा, चीन के धोखे को याद करा दिया.    

           भाजपा ने अमेरिका के राष्ट्रपति के भाषण का स्वागत किया है, लेकिन भाजपा के ही एक नेता रूढी ने ओबामा की यात्रा के ठीक पूर्व ओबामा की कटु शब्दों में आलोचना की. भाजपा ने इसके पहले, कम्युनिस्टों के साथ मिल कर भारत-अमेरिका परमाणु  करार की भी कटु आलोचना की थी और मनमोहन सिंह  की सरकार को गिराने की चेष्टा की थी. भाजपा को आज इस बात की सीख लेनी चाहिए कि जहाँ राष्ट्र हित का सवाल हो वहां मात्र विरोध के लिए राजनीति नहीं करनी चाहिए. अगर भाजपा ने देश में साम्प्रदाइकता का  
तानाबाना नहीं बुना होता तो आज कश्मीर में भी अलगाववादी आतंकी  पाँव नहीं जमा सकते थे. उम्मीद है कि ओबामा के आतंकवाद  के खिलाफ जंग की बात के बाद आतंकियों  के  नापाक पांव उखड़ने शुरू हो जायेंगे, हालाँकि भारत को उनके खिलाफ खुली जंग करनी होगी.  
                  

सोमवार, 1 नवंबर 2010

पत्रकारिता के बदलते रंग

                         कल की पत्रकारिता और आज की पत्रकारिता में बहुत अंतर आ गया है. पत्रकारिता के बुनियादी तत्वों में भी बदलाव आ गए  हैं. लेकिन,बदलाव की दिशा ठीक नहीं कही जा सकती है. यह बात जरूर है कि तकनीकी तौर पर पत्रकारिता में बहुत विकास हुआ है. समाचार सम्प्रेषण की गति बहुत तेज हुई है. अखबारों की बात करें तो उनका पृष्ठ संयोजन, तस्वीरों की चमक-दमक, छपाई और उनका 'ग्लैमर'  भी उनकी प्रगति को दर्शाते  हैं.
            अगर टीवी माध्यम की बात करें तो उस पर समाचारों ने एक चासनीदार नया कलेवर प्राप्त कर लिया है. कुल मिला कर,  तकनीकी प्रगति को नजरअंदाज कर दें, तो पत्रकारिता के स्तर में लगातार गिरावट आ रही है. पत्रकारिता का वर्तमान युग अवसाद पैदा करने वाला और बहुत हद तक नकारात्मक है.यह बहुत हद तक व्यक्तिगत  लेखन की ओर भी अग्रसर भी  हो रहा है.           
         कल और आज की पत्रकारिता में अंतर जानने के लिए आवश्यक  है कि हम पत्रकारिता की परिभाषा को सर्वप्रथम  देखें और उसके तत्वों का विश्लेषण करें. पत्रकारिता के अंतर्गत सूचनाओं का संकलन, समाचार लेखन, समाचार चयन, संपादन और सम्प्रेषण  प्रमुख कार्य हैं. पत्रकारिता का मूल  उत्पादन समाचार है. इसलिए समाचार  की परिभाषा ही पत्रकारिता की सही दिशा और दशा का परिचायक है.
           समाचार की सबसे अच्छी  वैज्ञानिक परिभाषा इस प्रकार है- समाचार वह आलेख है जो परिवर्तन को दर्शाता है और यह आलेख निश्चित रूप से जन हित में होना चाहिए. यानि, पत्रकारिता के दो स्पष्ट तत्व हैं:-
        १. समाचार परिवर्तन को दर्शाने वाला आलेख और,
        २. यह आलेख निश्चित रूप से जनहित में होना चाहिए. 
       परिवर्तन के तीन मुख्य चरण हैं:
         १. धनात्मक परिवर्तन, अर्थात प्रगति;
         २ ऋणनात्मक परिवर्तन, अर्थात अधोगति या अप्रगति
         ३. परिवर्तनहीनता जिसे अंग्रेजी में स्टैगनेशन  कहते हैं, अर्थात यथास्थिति. 
            अब हम जनहित की बात करें तो इस तत्व का अर्थ है कि समाचार अधिसंख्यक लोगों  के लिए हितकारी हो, देश हित में हो, मानवता के हित में हो. 
            जिस समाचार आलेख में ये दो तत्व न हों तो उस आलेख तो समाचार नहीं कह सकते हैं. पत्रकारिता की स्वतंत्रता या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि कोई स्वहित में या मुद्रा लोभ में आदेशित लेखन कर,  पत्रकारिता के मूल तत्वों को समाप्त कर दे. ऐसा लेखन न तो जनहित में है और न लोकतंत्र के हित में. पत्रकारिता की स्वतंत्रता के साथ जुड़े दायित्यों  पर भी आवश्यकरूप से  ध्यान देने  की आवश्यकता है.  से  एक आम  उदाहरण लें- एक बार एक व्यक्ति देश के एक अखबार का, राजनैतिक समर्थन से सम्पादक बन जाता है, और वह उस अखबार में अपने राजनैतिक आकाओं के हित का साधन करता है. कुछ वर्ष बाद, वह उसी राजनैतिक आकाओं की पार्टी का नेता बन जाता है. ऐसा प्रसंग आज की  पत्रकारिता में एक आम प्रसंग बन गया है. अब अगर उसके तथाकथित पत्रकारिता को देखें तो पायेंगे कि उसने अपनी कलम से जो कुछ भी लिखा, उसका उद्देश्य तो स्वार्थसाधन ही था. ऎसी स्थिति में हम यही कह सकते हैं कि उसने पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों का पालन नहीं किया और हकीकत में पत्रकारिता का दुरुपयोग किया. उसकी कथित पत्रकारिता को हम दुष्प्रचार या 'प्रोपगंडा' कह सकते हैं. जन विरोधी भी कह सकते हैं.
             कल की पत्रकारिता की विश्वसनीयता और आज की पत्रकारिता की विश्वसनीयता के स्तर में भी बहुत अंतर है. आज की पत्रकारिता की विश्वसनीयता गिरी है. कल की पत्रकारिता एक मिशन  थी, आज की पत्रकारिता एक पेशा बन कर रह गई है.  इसे सम्हालने का प्रयास भी कुछ स्तर पर हुआ है, लेकिन प्रयास में सामूहिकता की कमी के कारण यह प्रयास लगभग प्रभावहीन है.
           प्रत्रकारिता पर व्यावसायिकता  हावी है. समाचार बाजार में बिकने वाली आम सामग्री की तरह एक सामग्री बन गया है. जो अखबार और टीवी पहले दूसरों को ही प्रचार देते थे या स्वयं प्रचार के माध्यम थे आज उनको अपने 'सर्वश्रेष्ठ' होने का प्रचार करना पड़ता  है. वे अपने प्रचार के लिए बहुत बड़ा बजट बनाते हैं. बाजार  से व्यावसायिक विज्ञापन पाने के लिए यानि अधिकाधिक धन बटोरने के लिए, समाचार पत्रों और टीवी समाचार चैनलों में जंग चलती रहती है. सब के सब टीआरपी के बढ़ाने के लिए समाचारों को इस्तेमाल करते हैं. फलस्वरुप, सनसनीखेज समाचारों के लिखने का प्रचलन बहुत बढ़ गया है. समाचार चैनलों पर आम तौर से समाचार कम और दूसर चैनलों ले उधर लिए गए बसी मनोरंजन के कार्यक्रम ज्यादा दिखाए जाते हैं, और समाचार स्क्रौल में सिमटा सकुचा सा नजर आता है.
        दूसरी ओर,  स्टिंग के द्वारा पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े घोटालों को उजागर किया गया है. यह आधुनिक  पत्रकारिता की एक नई विधा है, लेकिन अनेक बार इसके दुरूपयोग की खबरें भी आयी हैं. यह विधा नई तकनीक की देन है.          पत्रकारिता में  नैतिकता का भी ह्रास हो रहा है. पत्रकारिता में जब हम नैतिकता की बात करते हैं तो, हम मुख्यरूप से  इन बिन्दुओं की ओर ध्यान देते हैं. लेकिन यह विधा बहुत प्रभावी  साबित हुई है. सारी खामियों के बावजूद आधुनिक पत्रकारिता ने वर्तमान युग की सबसे बड़ी महामारी भ्रष्टाचार से लड़ने का जो काम किया है, वह काबिले तारीफ़ है.

         १ . पत्रकारिता  सत्यनिष्ठ हो;
         २. जनहित में हो; 
         ३. वीभत्स  समाचार या दृश्यों  को इस प्रकार लिखा और दर्शाया  जाए कि उससे किसी के दिल दिमाग पर बुरा असर न पड़े.
         ४. बाल अपराधियों या बच्चों पर हुए अपराध की  घटनाओं में बच्चों की तस्वीर या उनका नाम पता न प्रकाशित केए जायें. महिलाओं पर हुए अत्याचार या अपराध को लिखने हुए पीड़िता की तस्वीर या पता न प्रकाशित किया जाये;
        ५.किसी अपराधी के परिवार के लोगों या उनके मित्रों  को समाचार में बेवजह न शामिल किया जाये;
       ६. सांप्रदायिक दंगों पर लेखन करते हुए समुदायों या जातियों का वर्णन न किया जाये और दंगा भड़काने वाले आलेख न छापे जायें.
       ७. एक सीमा तक, किसी की निजता में घुसपैठ न की जाये. अगर किसी कि निजता में प्रवेश करना जनहित में आवश्यक हो तो प्रवेश किया जा सकता है, लेकिन यह कार्य तभी सम्पादित किया जाना चाहिए जब यह बात तथ्यपूर्ण ढंग से स्पष्ट हो कि लक्ष्य  व्यक्ति अपनी निजता में गैर कानूनी काम कर रहा है.  
       ८.  व्यावसायिकता के लक्ष्यों की प्राप्ति के क्रम में पत्रकारिता के नैतिक सिद्धांतों की बलि न चढ़ाई जाए.    इनके अलावा भी पत्रकारिता की  नैतिकता  और भी आयाम हैं.
        अगर हम इन आयामों की और ध्यान दें तो पायेंगे की पत्रकारिता में अब इनकी ओर ज्यादा  ध्यान नहीं दिया जाता है. कुछ ही दिनों पहले  एक माध्यम पर एक आदमी को आग लगा कर मर ने  के दृश्यों को दिखलाया गया, जबकि उन दृश्यों को संकलित करने वाले व्यक्ति को देश के कानून के  अंतर्गत  अपराध में सहयोग  का दोषी पाते हुए दंड दिया जाना चाहिए था. मुंबई में आतंकी हमले के समय जीवंत कमांडो कार्यवाही को दिखलाने   के कारण आतंकियों  को  मदद मिल गयी.
     अनेक माध्यमों  ने  आतंकवादियों, देश  की अखण्डता के विरोधियों, सम्प्रदाइक  तत्वों आदि को बहुत प्रचार दे कर आम लोगों में भ्रम और दहशत पैदा करने का भी काम किया है.
      लेकिन  आशा की जानी चाहिए की  पत्रकारिता में अवसाद का यह युग समाप्त होगा और फिर एक बार पत्रकारिता  अपने मूल धर्म के साथ विकसित होगी  और देश में जनहित का  मिसाल कायम करेगी. यह  साफ़ दिख रहा है कि आने वाली पढ़ी सामप्रदायिकता और सनसनीखेज पत्रकारिता से ऊब गई है, और वह उसमें बदलाव चाहती है. यह एक शुभ संकेत है. 
         

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

आखिर मुंडा जी ने सरकार बना ली और झामुमो में बगावत

झारखण्ड  मुक्ति मोर्चा के चार विधायकों ने स्पष्ट  कर दिया है कि वे मौक़ा मिलते ही मुंडा सरकार को गिरा देंगें और सरकार की  छवि पर कुछ दागी मंत्री  भी दाग लगाने के लिए मौजूद हैं.
       झामुमो के विधायक साईमन मरांडी, सीता सोरेन, टेकलाल महतो और लोबिन हेम्ब्रोम ने विद्रोह का झंडा ऊठा लिया है. साईमन मरांडी ने कहा कि उनको जब मौक़ा मिलेगा वे सरकार को गिरा देंगें. वे सरकारी पक्ष में होते हुए भी विपक्ष के साथ रहेंगे. वे अपनी सदस्यता बचाते हुए मुंडा सरकार पर निशाना साधने से कभी चूकेंगे नहीं. उन्होंने कहा कि मोर्चा के वरिष्ठ सदस्यों को दरकिनार कर, सिबू सोरेन ने  अपने बेटे के हाथ में पार्टी को थमा दिया है. क्या पार्टी का गठन सिबू सोरेन के बेटे के लिए हुआ था.
        सिबू सोरेन की बहु और विधायक सीता सोरेन ने सिर्फ इतना ही कहा कि अब जब मनमानी हो ही गई है तो  देखिये आगे और क्या-क्या होता है. पिछली बार जब सिबू सोरेन को अपना मुख्यमंत्री पद बचाने के लिए विधान सभा का चुनाव लड़ना था तब सीता सोरेन ने  सिबू सोरेन के लिए सीट खाली नहीं की थी. इस बार उनको इसी अपराध में मन्त्री पद से वंचित कर दिया गया. मंत्रियों के शपथ ग्रहण  समारोह में भी सीता  सोरेन और असंतुष्ट अन्य तीन विधायकों को आने का आमंत्रण भी नहीं दिया गया.
      जहाँ तक भाजपा में असंतुष्ट विधायकों और नेताओं का सवाल है, वे किसी भी दिन  मुंडा सरकार के लिए संकट खड़ा कर सकते हैं. भाजपा की परम्परा है कि वे जब तक उसे किसी नेता से लाभ मिल रहा है उसे पूरा सम्मान और पावर दिया जाता है और काम निकलते ही उनको यूज एंड थ्रो के सिद्धांत  पर दरकिनार कर दिया जाता है. पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रघुवर दास जब तक यूस के लायक थे पार्टी में उनकी तूती बोलती थी लेकिन जैसे ही वे भाजपा अध्यक्ष नितिन  गडकरी और अर्जुन मुंडा से टकराए और अडवाणी की मदद से मुख्यमंत्री बनने का प्रयास किया, वे पार्टी में अब एक  साधारण कार्यकर्ता के अलावा कुछ भी नहीं रह गए हैं. उनके गुट के भाजपाई अभी वेट और वाच की स्थिति में हैं. उनका विश्वास है कि नितिन गडकरी ज्यादा दिनों तक भाजपा के अध्यक्ष नहीं रह पायेंगे. उनको लग रहा है कि गडकरी की तानाशाही के कारण बिहार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डा. सी पी ठाकुर ने इस्तीफा दे दिया है.
            गडकरी की नीति है कि जितनी जल्दी हो सके सीनियर नेताओं का मनोबल गिरा दिया जाये और पार्टी में अपना एक क्षत्र राज कायम कर लिया जाये. पार्टी के वरिष्ठ नेता इस रणनीति को समझ चुके हैं. भाजपा में राष्ट्रीय स्तर पर गडकरी के खिलाफ जो मोर्चेबंदी शुरू हुई है उसका नतीजा बिहार चुनाव के साथ सामने आ जाएगा. कुल मिला कर अब अर्जुन मुंडा के सामने एक ही उपाय बचा है वह है बोर्ड और निगमों की राबड़ी  असंतुष्टों को के हाथों में डालना, लेकिन वे राबड़ी से मानेंगे नहीं.          

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

बिहार चुनाव: दागियों को टिकट देने में भाजपा सबसे आगे

पटना: बिहार में चुनावी घमासान शुरू हो गया है और दागियों को टिकट देने में भाजपा ने तगड़ी लीड ले ली  है.  प्रमुख दलों, भाजपा, जदयू, राजद, लोजपा और  कांग्रेस के उम्मीदवारों की सूची में कुल ८० उम्मीदवार दागी हैं और उनमें से ४१ भाजपा के हैं. 
           दागियों को टिकट दे कर भाजपा, जदयू, राजद,  और लोजपा  ने अपना-अपना परिचय बनाये रखा है कि  वे जो बोलते हैं, उस पर कभी चलते नहीं. वैसे, इन तीनों दलों की स्पष्ट मान्यता है कि दल का टिकट उसे ही दो, जो  जीतने का दमखम रखता हो. नीतीश का तो भाषण ही शुरू होता है, गुंडा राज मिटाने के संकल्प से लेकिन वे सहारा तो हमेशा से लेते हैं दागियों का.  लगता है कि इस बार नीतीश ज्यादा गंभीर नहीं हैं, लेकिन उनकी सहयोगी भाजपा ने दागियों को रिकार्ड संख्या में टिकट दे कर उनका काम पूरा कर दिया है.
        नीतीश ने पिछले चुनाव में जिन-जिन दागियों को अपने 'साफ़ सुथरे' दल का टिकट दिया था, उनमें  से एक ने विधायक बनते ही जो तमाशा पटना के एक होटल में किया  था, उसका दूसरा मिसाल मिलना मुस्किल है.
          राजद और लोजपा तो दागियों की पुरानी शरण स्थली है ही और पासवान  लालू "वीनिंग उम्मीदवार" को ही टिकट देते हैं . यही कारण है कि लालू जी ने  चुनाव के पहले वे जेल जा कर शहाबुद्दीन साहब  से मिल आये. उनकी सलाह से उन्होंने लगभग चार तगड़े उम्मीदवार तय किये हैं. इस बार लालू जी के ददन पहलवान ने राजद का दामन छोड़ कर अपना अलग अखाड़ा जमा लिया है. उनके पास ताकत है तो फिर पार्टी की चिंता क्या करना. वे तो हमेशा ताकत के बल पर राजनीति करने में माहिर हैं.
           लालू जी इस बार ताकतवर उम्मीदवारों के मामले में पिछड़ गए हैं. उनके  ६५ उम्मीदवारों में मात्र नौ ही दागी हैं.  कांग्रेस ने भी कुछ तगड़े  उम्मीदवार खड़े किये हैं या तगड़े  लोगों के सगे या पत्नी को चुनाव लड़वाने के मूड में हैं. लवली आनंद कांग्रेस में हैं, जो जेल में सजा काट रहे  पूर्व सांसद आनंद मोहन की पत्नी है. वह चुनाव लड़ रही हैं. कांग्रेस के ७७ उम्मीदवारों में सिर्फ पांच दागी हैं.  
        अपने दल को सर्वादिक सभ्य  मानने  वाली भाजपा ने सर्वाधिक  दागियों को टिकट दिए हैं. भाजपा के ८७ उम्मीदवारों में ४१ दागी हैं और कुछ तो उसकी साम्प्रदायिकता  तो जीवंत रखने वाले उम्मीदवार हैं. सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ कर वोट लेने में माहिर भाजपा ने वैसे उम्मीदवारों को टिकट दिया है, जो सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने के लिए इस चुनाव में प्रभावी  भूमिका निभायेंगे. 
       लोजपा की ३८ उम्मीदवारों की  पहली सूची में ८ उम्मीदवार दागी हैं. लगता है की पासवान जी को भी इस बार पहलवान छाप  के नेता नहीं मिले. 

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

ज्योतिषियों के चक्कर में फंसी मुंडा सरकार

रांची: अर्जुन मुंडा सरकार ज्योतिषियों के चक्कर में फंस गयी है या अपने ही जाल में उलझ गई है-इन्हीं दो पहलुओं के बीच इस सरकार की नैया डगमगा रही है. मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा का कहना है कि वे इस बार कोई 'रिस्क' नहीं लेना चाहते हैं, इस लिए वे  ज्योतिषियों से मिले और आगामी आठ तारीख़ को उनकी सलाह पर वे मंत्रिमंडल का विस्तार करेंगे. दकियानूसी का इससे बड़ा उदाहरण  भारतीय राजनीति में  कहीं नहीं मिलेगा.
         लोग प्रश्न करने लगे हैं कि क्या अर्जुन मुंडा अपनी सरकार की सलामती के लिए कोई राज ज्योतिषी तो नियुक्त नहीं करेंगे. क्या अर्जुन मुंडा मंत्रिमंडल की बैठक की तिथियाँ भी ज्योतिषियों की सलाह पर निर्धारित करेंगे. वस्तुतः ज्योतिषीय सलाह के नाम पर अर्जुन मुंडा ज्यादा से ज्यादा समय चाहते हैं, ताकि वे अपने जहाज से उड़ते-भागते विधायकों को सहेज सकें और कम से कम पांच दस माह राज सुख  भोग सकें. वे  समय चाहते हैं ताकि शिबू सोरेन और उनके पुत्र हेमंत सोरेन को भी पटरी पर ला सकें. रह-रह कर शिबू सोरेन का ह्रदय मुख्यमंत्री बनने के लिए लालायित होने लगता है. जदयू भी विद्रोह के मूड में है तो आजसू में भी कम उठा-पटक नहीं चल रही है.  आजसू सुप्रिमो सुदेश महतो के लिए अपने कुनबे को सम्हालना मुश्किल   हो गया है. 
         हाल में संविधान का हवाला देते हुए राज्यपाल एमओएच फारूख ने मुख्यमंत्री  को पत्र लिख कर कहा है कि वे आठ तारीख़ तक अपने मंत्रिमंडल का विस्तार कर लें. लेकिन हालात कहते हैं कि मुंडा अपने मंत्रिमंडल का शायद ही विस्तार कर पाएं. भाजपा के आरएसएसवादी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने मुंडा विरोधी रघुवर दास के पर जिस तरह कतरने की कोशिश की है, उसका परिणाम पार्टी को भुगतना ही पडेगा. आरएसएस से भाजपा में आये नेता भी गैर आरएसएसवादी अर्जुन मुंडा के बढ़ते कद और प्रभाव  को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं. 

-जिया

           

शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

पुरस्तक समीक्षा

पुरस्तक समीक्षा
बुद्ध के चार आर्य सत्य और दुखों का निवारण
दिलीप तेतरवे
रांची: डा. ऊमाचरण झा की पुस्तक," द फोर नोबल ट्रूत्स   एंड द धर्मपदा", श्रीलंका में बौद्ध धर्म के प्रचार और वहां इस धर्म के आधार पर पनपी संस्कृति का आईना है. श्रीलंका में बौद्ध मत अपनाया गया और उसे अपनी भौगोलिक स्थिति के अनुरूप परिस्कृत भी किया गया. संवर्धित किया गया. कुलमिला कर यह पुस्तक एक वास्तविक शोध ग्रन्थ है. 
         बुद्ध ने दुःख को चार कोटियों में विभाजित कर उनके होने के कारण बताए और दुःख दूर करने के सहज उपायों से भी दुनिया को अवगत कराया. प्रथम आर्य सत्य है- सब्बम दुक्खं -दुःख सर्वत्र व्याप्त  है. बुद्ध ने कहा है, नश्वरता बहुत दुखदाई है. इसे दूर करने के लिए "स्व" भावना को ह्रदय से तिरोहित करने की आवश्यकता है-नेतम मना,नसों हमस्मी, ना मेसो अनाति." 
          बुद्ध ने दूसर आर्य सत्य में बताया कि दुःख के क्या-क्या कारण हैं. यह किन-किन कारणों से उत्पन्न हो कर मानव को किस-किस तरह से उत्पीड़ित करते हैं. मानव की इंद्रियाँ- आँख, कान, नाक, जिह्वा, शरीर और मस्तिष्क सुख पाने की चेष्टा करते-करते, दुःख के सागर में विलीन हो जाते  हैं. मानव की लालसाएं अनंत हो जाती हैं और वह मृत्यु  के बाद मोक्ष पाने की जगह पुन:  जन्म लेने की प्रक्रिया में चला जाता है. दुःख का एक सिलसिला बन जाता है. 
          बुद्ध ने कहा कि दुखों के निवारण का तीसरा आर्य सत्य है, मुक्ति. मुक्ति का मार्ग क्या है ? जन्म-मरण से हम कैसे मुक्ति पा सकते हैं ? मुक्ति के उपाय बताते हुए बुद्ध ने कहा, "जैसे सागर के जल का स्वाद खारा होता है, वैसे ही मेरे धर्म मार्ग का स्वाद मुक्ति है." बुद्ध ने सन्देश दिया," लिप्सा त्याग कर जीवन को मुक्ति प्रदान करो." 
          दुःख निवारण का चौथा आर्य सत्य यह जानने में है कि निवारण का मार्ग क्या है ? बुद्ध का सन्देश है कि अन्धकार में भटकने से अच्छा है कि मानव अपना मार्ग, धर्म से प्रकाशित करे. मानव को बुद्ध के इन आठ सूत्रों को जीवन में उतारना चाहिए- १. सही समझ,२. उत्तम विचार,३. उचित वाणी, ४. उचित क्रियाकलाप,५. उचित रहन-सहन,६. उचित प्रयास,७. उचित मनःस्थिति  और ८. उचित ध्यान. 
          डा. ऊमाचरण  झा की यह पुस्तक नोवेल्टी एंड कम्पनी, पटना द्वारा प्रकाशित है. इस हार्ड बाउंड पुस्तक में २४१ पृष्ठ हैं. पुस्तक का मूल्य है ४५० रुपए है. पुस्तक पठनीय और संग्रहनीय है. 

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

भाजपा के अयोध्यायी तेवर से एनडीए में दरार बढ़ेगी

रांची: झारखण्ड की राजनीति में अयोध्या पर आया न्यायालय का फैसला क्या रंग लाता है, इस पर सरकार के सभी सूचना और अन्वेषण तंत्र काम कर रहे हैं, साथ ही साथ, भाजपा इसे भुनाने की जुगत में भी लगी है. लेकिन उसने अगर झारखण्ड में कोई फिर साम्प्रदाइक  खेल  खेलना शुरू किया तो, उसे सबसे पहले जदयू , झामुमो और आजसू के विरोध का सामना करना पडेगा. 
            अयोध्या फैसले के बाद जदयू के नेता बहुत सचेत हैं. ऐसे भी वे मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा की राजनीति से तिलमिलाए हुए हैं. जदयू का एक भी प्रतिनिधि मुंडा मंत्रिमंडल में नहीं लिया जा रहा है. फिर बिहार में विधान सभा चुनाव में भाजपा की नई रणनिती का भी निर्माण अयोध्या फैसले के आधार पर किया जा रहाहै. 
            नीतीश कुमार ने अपने करीबियों को भाजपा की नई रणनीति पर नजर रखने के लिए लगा दिया  है. नीतीश कुमार को मुसलमानों के वोट का प्रतिशत घटने का भय पहले से ज्यादा हो गया है. वे नरेंद्र मोदी के प्रकोप से ज्यादा बड़ा प्रकोप  भाजपा की नई रणनीति और  उत्साह को मान रहे हैं. कहीं इस फैसले पर अगर भाजपा ने ज्यादा उछल-कूद की तो जदयू का चुनावी समीकरण ही गड़बड़ा जाएगा.
            भाजपा के एक नेता ने भाजपा हाई कमान से कहा है कि इस फैसले के बाद भाजपा को बिहार की सभी सीटों पर चुनाव लड़ना चाहिए. भाजपा चुनाव में अकेली क्लीन स्वीप कर सकती है.  इसकी भनक झारखण्ड जदयू तक पहुंची है. ऐसा प्रतीत होता है कि बिहार चुनाव का दृश्य बदलेगा और उसका पूरा असर झारखण्ड पर भी पडेगा.
            झामुमो को भी मुसलमानों के वोट की सख्त जरूरत है, लेकिन भाजपा के नए अयोध्यायी तेवर से उसके अंदर खलबली मची हुई है. शिबू सोरेन तो शुरू से ही भाजपा से दूरी बनाये रखने के पक्षधर थे , लेकिन पुत्र हट के कारण उनको भाजपा से लिखित माफ़ी भी मांगना पड़ा और मुख्यमंत्री  पद की दावेदारी भी छोडनी पड़ी. वैसे अभी शिबू सोरेन अपने पुत्र हेमंत सोरेन की रजनीति से स्वयं खार खाए हुए हैं. पार्टी पर उनकी पकड़ बहुत कमजोर हो गई है और से इस हालात में अपने को मजबूर पा रहे हैं.