शनिवार, 7 अगस्त 2010

कश्मीर समस्या के लिए भाजपा की साम्प्रदाइक नीति सबसे ज्यादा जिम्मेदार


            कश्मीर में आज जो विकराल समस्या पैदा हुई है, उसके लिए भाजपा की  साम्प्रदाइक नीति सब  से ज्यादा जिम्मेदार है. यह बात सच है कि  पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने घाटी में अपने पैर जमा लिए हैं और वे कश्मीर के  पाकिस्तान के साथ विलय के लिए खुलेआम मांग कर रहे हैं. केंद्र और कश्मीर की सरकार ने सम्मिलितरूप से आतंकवादियों की जड़ हिलाने में सफलता नहीं पाई है. लेकिन,  कश्मीर में आतंकवादियों को पैर जमाने में भाजपा की साम्प्रदाइक नीति सबसे अधिक जिम्मेदार है. संविधान में कश्मीर को दिए गए विशेष दर्जे को समाप्त करने की मांग को लेकर भाजपा, बजरंगदल की कारगुजारियां और दंगे की राजनीति ने कश्मीर के मुसलमानों को  ही नहीं, भारत के अन्य हिस्सों के मुसमानों को भी सशंकित कर दिया है.
           भाजपा ने कश्मीर में और कश्मीर के बहार भी हिन्दू और मुसलमानों के बीच खाई खोदने का कभी कोई अवसर कभी  नहीं छोड़ा है, और अगर अवसर हाथ नहीं आ रहा है तो, उसने  अवसर पैदा किया है. आखिर भाजपा के पूज्य सावरकर ने ही तो भारत विभाजन  की  रूपरेखा अंग्रेजों के साथ मिल कर बनाई थी और उनकी संचालक  संस्था आर. एस. एस. हमेशा से कथित हिन्दू संस्कृति और हिन्दू राष्ट्र की बात गढ़ती रही है. उसने भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति को कभी नहीं स्वीकारा. उसने मनु के  हिन्दू विरोधी ग्रन्थ से कभी अपने को अलग करने कोशिश नहीं की, जिस ग्रन्थ के कारण हिन्दू यानी सनातन धर्म का विनाश हो गया और हिन्दू समाज जाति भेद की बीमारी से आज तक त्रस्त है उससे वह आज तक चिपकी हुई है.
           भाजपा ने देश को हमेशा इमोशनल ब्लैकमेल  किया है. कभी अयोध्या में राम मंदिर बनाने के नाम पर तो कभी ईसाइयों के खिलाफ  हिंसक वारदात कर या वारदात करने वालों  को  समर्थन दे कर. भाजपा की राजनीती कभी  भी रचनात्मक नहीं रही है. अयोध्या में मस्जिद को गिराने में भाजपा और बजरंगदल का कितना हाथ है, यह किसी से छिपा नहीं है.खैर, इस पर न्यायालय विचार कर रहा है. लेकिन मुजरिमों को सबने टेलीविजन अपनी आँखों से देखा है. न्यालय की प्रक्रिया लम्बी चलती है और इसी का फायदा भाजपा और उसके आका संगठन आर.एस.एस. हेशा उठाते रहे हैं. भारत आतंरिक और जातीय एकता तो तोड़ने में भाजपा की स्पष्ट भूमिका रही है.
         जो दल राष्ट्रवाद की बात करती है, उसे तो देश की एकता को और मजबूत करने वाली नीति अपनानी चाहिए थी, लेकिन उसकी नीति पूर्ण रूप से कट्टरवादी है जो लोकतंत्र कि स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक है. अनेक  बार अयोद्या के नाम पर या राम के नाम पर उसने आम जनता को ठगा है. रामायण के हर कांड में आदर्श  है, जबकि भाजपा ने जितने भी कांड किये हैं, उनमें आदर्श की बात सोची ही नहीं जा सकती है! उसे इस बात का अहसाह है कि  बिना भावना भड़काए वह चुनाव में विजय हासिल  नहीं कर सकती है.इसी अहसास के कारण,  पिछले कुछ चुनावों में उसने बार-बार राम मंदिर के मामले को गर्माने की कोशिश की.  उसकी इस नीति पर उसके ही दल के नेता और पत्रकार अरुण शौरी ने कहा था-"किसी  कारतूस का दुबारा प्रयोग नहीं किया जा सकता है." लेकिन गडकरी इस मुद्दे को फिर उठाने की बात कर रहे हैं. एक बार अडवाणी की घोर साम्प्रदाइक रथ यात्रा ने देश की साम्प्रदाइक एकता को तार तार कर दिया था लिकिन अब ऐसा प्रतीत हॉट है कि आज का युवा वर्ग भाजपा कि नीति में कतई विश्वास नहीं रखता हैं. लेकिन इस प्रचारवादी पार्टी को भावना भड़काने के अनेक तौर तरीके आते हैं. इस लिए उसकी नीति से देश को हर मोड़ पद हानि उठानी पद सकती है.

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

गडकरी:भाजपा पर आर एस एस द्वारा लादा गया एक और नेता

एक नजर
भाजपा के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसके पास ऐसे नेता की कमी है, जो अटल बिहारी बाजपेयी जैसा कद्दावर हो, और प्रखर वक्ता भी. आर एस एस ने नीतिन  गडकरी के रूप  में एक ऐसा नेता भाजपा को दिया है, जो प्रभावकारी  नहीं हैं. उनमें  प्रौढ़ता भी नहीं है. वे पार्टी में भी आर एस एस द्वारा लाद दिए गए नेता के रूप में देखे जाते हैं. भारत की आम जनता के लिए वे एक अनजान पहेली के सामान हैं.


गडकरी का पिछले दिनों प्रयास रहा कि वे देशभर में रातों रात चर्चा में आ जायें,  लेकिन उनका यह  प्रयास उल्टा ही पड़ा. उन्होंने सोचा था कि वे कुछ अधिक वाचालपना दिखा के चमक जायें. उन्होंने ताव में आ कर अफजल को कांग्रेस का दामाद कह दिया.देश ने उनकी बे सर पैर की इस टिपण्णी को स्वीकार नहीं किया. देशभर में उनकी इस ओछी टिपण्णी के लिए, उनको और उनकी पार्टी को  तीखी आलोचना का शिकार होना पडा.


गडकरी ने एक लुंजपुंज नेता की छवि पैदा की  है और भाजपा के बुजुर्ग नेताओं ने उनको उलटी सीधी पट्टी पढ़ानी भी  शुरू कर दी  है. पार्टी में फिर से एक बार लालकृष्ण आडवाणी और उनके समर्थकों की बन आई है. जिन्ना समर्थक जसवंत सिंह की भाजपा में वापसी, लालकृष्ण आडवाणी की जिन्ना नीति की जीत है. आजादी के समय के इतिहास को छानने से पता चलता है की आर एस एस के करीबी सावरकर ने भारत विभाजन  की रूपरेखा तैयार की और जिन्ना के माध्यम से अंग्रेजों ने उसको अमली जामा पहनाया. यहीं  से जिन्ना के प्रति आर एस एस और बाद में भाजपा में जिन्ना समर्थकों को बल मिल गया. वे गान्धी, नेहरु और राजेंद्र बाबु की छवि को धूमिल करने के लिए, जिन्ना सम्बन्धी किताबें लिखने लगे. जब देश ने उनके जिन्ना प्रेम को स्वीकार नहीं किया तो, जसवंत सिंह   को थोड़े दिनों तक के लिए पार्टी से निकालने का नाटक, पार्टी के शीर्ष  नेताओं ने रचा. लेकिन जिन्ना समर्थक को अब फिर से देश कबूल नहीं करेगा. जनता की स्मरण शक्ति इतनी कमजोर नहीं है, जितनी भाजपा के नेता समझते हैं. जनता जानती है कि भाजपा का इतिहास क्या है और उसकी संचालक संस्था ने  आजादी के संग्राम में क्यों कोई भागीदारी नहीं निभाई. 


आर एस एस की तरह भाजपा के पास भी कई मुखौटे हैं. वे हर मुखौटे से काम तो लेतें हैं , लेकिन कोई मुखौटा किसी लफड़े में  फंस जाए तो, वे उस मुखौटे को अपने लिए अनजान घोषित कर देते हैं. राजनीतिक संकट आने पर, उनके सारे मुखौटे एक स्वर में बोलने लगते हैं या यह कहें कि आर एस एस के स्वर  में बोलने लगते हैं. ऎसी पार्टी लोकतंत्र के लिए कितना उचित है, इस पर विचार  करने का समय आ गया है. 


गडकरी ने भाजपा अध्यक्ष की कुर्सी सम्हालते ही कहा था कि मुंबई में उनकी  सहयोगी पार्टी शिव सेना के द्वारा बिहारियों या हिंदी बोलने वालों के खिलाफ चलाए गए   हिंसात्मक आन्दोलन पर, उनकी नजर है. वे शिव सेना की इस नीति को स्वीकार नहीं करते हैं. लेकिन, यह सिर्फ एक टालू बयान था. गडकरी की शिव सेना से उतनी ही नजदीकी है, जितनी कि उनकी आर एस एस से है. शिव सेना का मामला लें या फिर नीतीश के द्वारा नरेंद्र मोदी के बिहार के विधान सभा  चुनाव में भागीदारी पर विरोध का, वे दोनों में से किसी भी मामले को ठीक से सम्हाल नहीं पाए. बिहार में भाजपा और उसके  सहयोगी जदयू के बीच इस मामले पर जम कर तकरार हुई. भाजपाइयों ने नीतीश की डिनर पार्टी का न्योता ठुकरा दिया. बाद में जदयू ने ही  जमीनी हकीकत  देखी. उनको लग रहा था कि  इस विवाद के बाद नीतीश को मुस्लिम समुदाय का भरपूर सहयोग मिलेगा और अनेक मुस्लिम नेता उनके दल में शामिल हो जायेंगे. लेकिन, जब उनको पता चला कि मुस्लिम नेता नरेंद्र मोदी फसाद को एक ड्रामा मानते हैं तो, नीतीश ने  भाजपाइयों के नाश्ते पर सीज फायर की घोषणा  कर दी. इस सीज फायर में भी गडकरी कहीं नहीं नजर आये. यह तो नीतीश की सोची समझी चाल के कारण संभव हो पाया.


बिहार पर कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की नजर है. वे वहां कांग्रेस की खोई जमीन वापस पाने के लिए जोर लगाये हुए  हैं. उनका प्रभाव भी दिख रहा है. उनकी पार्टी ने सभी दलों में सेंधमारी शुरू कर दी है. ऐसे में, गडकरी के रूप में भाजपा का कमजोर नेतृत्व  बिहार में पहले से ही  कमजोर भाजपा को कितना मजबूत कर पायेगा कह पाना मुश्किल है. वहां भाजपा के  अस्तित्व पर संकट के बदल छाये हुए  हैं. नीतीश की स्पष्ट नीति है की भाजपा को और कमजोर करते हुए  अपनी शक्ति बढ़ाते हुए चले जायें और एक दिन बिहार में अपना  स्वतंत्र राज कायम कर लें. 


गडकरी तो इन सब स्थितियों से आँख मूंदे नजर आते हैं. वस्तुतः गडकरी गुटबाजी से ग्रस्त भाजपा को पटरी पर लाने में सक्षम नहीं हैं. उनका प्रयास है , किसी तरह अपनी कुर्सी से  चिपके  रहने का. परिणामस्वरूप, उन्होंने  सभी पुराने और दिग्गज नेताओं से एक साथ अच्छे सम्बन्ध बनाने के लिए जो नीति बनाई है, वह उनकी गद्दी के लिए तो फायदेमंद हो  सकती  है, लेकिन भाजपा के लिए नहीं.