गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

बिहार चुनाव: दागियों को टिकट देने में भाजपा सबसे आगे

पटना: बिहार में चुनावी घमासान शुरू हो गया है और दागियों को टिकट देने में भाजपा ने तगड़ी लीड ले ली  है.  प्रमुख दलों, भाजपा, जदयू, राजद, लोजपा और  कांग्रेस के उम्मीदवारों की सूची में कुल ८० उम्मीदवार दागी हैं और उनमें से ४१ भाजपा के हैं. 
           दागियों को टिकट दे कर भाजपा, जदयू, राजद,  और लोजपा  ने अपना-अपना परिचय बनाये रखा है कि  वे जो बोलते हैं, उस पर कभी चलते नहीं. वैसे, इन तीनों दलों की स्पष्ट मान्यता है कि दल का टिकट उसे ही दो, जो  जीतने का दमखम रखता हो. नीतीश का तो भाषण ही शुरू होता है, गुंडा राज मिटाने के संकल्प से लेकिन वे सहारा तो हमेशा से लेते हैं दागियों का.  लगता है कि इस बार नीतीश ज्यादा गंभीर नहीं हैं, लेकिन उनकी सहयोगी भाजपा ने दागियों को रिकार्ड संख्या में टिकट दे कर उनका काम पूरा कर दिया है.
        नीतीश ने पिछले चुनाव में जिन-जिन दागियों को अपने 'साफ़ सुथरे' दल का टिकट दिया था, उनमें  से एक ने विधायक बनते ही जो तमाशा पटना के एक होटल में किया  था, उसका दूसरा मिसाल मिलना मुस्किल है.
          राजद और लोजपा तो दागियों की पुरानी शरण स्थली है ही और पासवान  लालू "वीनिंग उम्मीदवार" को ही टिकट देते हैं . यही कारण है कि लालू जी ने  चुनाव के पहले वे जेल जा कर शहाबुद्दीन साहब  से मिल आये. उनकी सलाह से उन्होंने लगभग चार तगड़े उम्मीदवार तय किये हैं. इस बार लालू जी के ददन पहलवान ने राजद का दामन छोड़ कर अपना अलग अखाड़ा जमा लिया है. उनके पास ताकत है तो फिर पार्टी की चिंता क्या करना. वे तो हमेशा ताकत के बल पर राजनीति करने में माहिर हैं.
           लालू जी इस बार ताकतवर उम्मीदवारों के मामले में पिछड़ गए हैं. उनके  ६५ उम्मीदवारों में मात्र नौ ही दागी हैं.  कांग्रेस ने भी कुछ तगड़े  उम्मीदवार खड़े किये हैं या तगड़े  लोगों के सगे या पत्नी को चुनाव लड़वाने के मूड में हैं. लवली आनंद कांग्रेस में हैं, जो जेल में सजा काट रहे  पूर्व सांसद आनंद मोहन की पत्नी है. वह चुनाव लड़ रही हैं. कांग्रेस के ७७ उम्मीदवारों में सिर्फ पांच दागी हैं.  
        अपने दल को सर्वादिक सभ्य  मानने  वाली भाजपा ने सर्वाधिक  दागियों को टिकट दिए हैं. भाजपा के ८७ उम्मीदवारों में ४१ दागी हैं और कुछ तो उसकी साम्प्रदायिकता  तो जीवंत रखने वाले उम्मीदवार हैं. सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ कर वोट लेने में माहिर भाजपा ने वैसे उम्मीदवारों को टिकट दिया है, जो सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने के लिए इस चुनाव में प्रभावी  भूमिका निभायेंगे. 
       लोजपा की ३८ उम्मीदवारों की  पहली सूची में ८ उम्मीदवार दागी हैं. लगता है की पासवान जी को भी इस बार पहलवान छाप  के नेता नहीं मिले. 

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

ज्योतिषियों के चक्कर में फंसी मुंडा सरकार

रांची: अर्जुन मुंडा सरकार ज्योतिषियों के चक्कर में फंस गयी है या अपने ही जाल में उलझ गई है-इन्हीं दो पहलुओं के बीच इस सरकार की नैया डगमगा रही है. मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा का कहना है कि वे इस बार कोई 'रिस्क' नहीं लेना चाहते हैं, इस लिए वे  ज्योतिषियों से मिले और आगामी आठ तारीख़ को उनकी सलाह पर वे मंत्रिमंडल का विस्तार करेंगे. दकियानूसी का इससे बड़ा उदाहरण  भारतीय राजनीति में  कहीं नहीं मिलेगा.
         लोग प्रश्न करने लगे हैं कि क्या अर्जुन मुंडा अपनी सरकार की सलामती के लिए कोई राज ज्योतिषी तो नियुक्त नहीं करेंगे. क्या अर्जुन मुंडा मंत्रिमंडल की बैठक की तिथियाँ भी ज्योतिषियों की सलाह पर निर्धारित करेंगे. वस्तुतः ज्योतिषीय सलाह के नाम पर अर्जुन मुंडा ज्यादा से ज्यादा समय चाहते हैं, ताकि वे अपने जहाज से उड़ते-भागते विधायकों को सहेज सकें और कम से कम पांच दस माह राज सुख  भोग सकें. वे  समय चाहते हैं ताकि शिबू सोरेन और उनके पुत्र हेमंत सोरेन को भी पटरी पर ला सकें. रह-रह कर शिबू सोरेन का ह्रदय मुख्यमंत्री बनने के लिए लालायित होने लगता है. जदयू भी विद्रोह के मूड में है तो आजसू में भी कम उठा-पटक नहीं चल रही है.  आजसू सुप्रिमो सुदेश महतो के लिए अपने कुनबे को सम्हालना मुश्किल   हो गया है. 
         हाल में संविधान का हवाला देते हुए राज्यपाल एमओएच फारूख ने मुख्यमंत्री  को पत्र लिख कर कहा है कि वे आठ तारीख़ तक अपने मंत्रिमंडल का विस्तार कर लें. लेकिन हालात कहते हैं कि मुंडा अपने मंत्रिमंडल का शायद ही विस्तार कर पाएं. भाजपा के आरएसएसवादी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने मुंडा विरोधी रघुवर दास के पर जिस तरह कतरने की कोशिश की है, उसका परिणाम पार्टी को भुगतना ही पडेगा. आरएसएस से भाजपा में आये नेता भी गैर आरएसएसवादी अर्जुन मुंडा के बढ़ते कद और प्रभाव  को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं. 

-जिया

           

शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

पुरस्तक समीक्षा

पुरस्तक समीक्षा
बुद्ध के चार आर्य सत्य और दुखों का निवारण
दिलीप तेतरवे
रांची: डा. ऊमाचरण झा की पुस्तक," द फोर नोबल ट्रूत्स   एंड द धर्मपदा", श्रीलंका में बौद्ध धर्म के प्रचार और वहां इस धर्म के आधार पर पनपी संस्कृति का आईना है. श्रीलंका में बौद्ध मत अपनाया गया और उसे अपनी भौगोलिक स्थिति के अनुरूप परिस्कृत भी किया गया. संवर्धित किया गया. कुलमिला कर यह पुस्तक एक वास्तविक शोध ग्रन्थ है. 
         बुद्ध ने दुःख को चार कोटियों में विभाजित कर उनके होने के कारण बताए और दुःख दूर करने के सहज उपायों से भी दुनिया को अवगत कराया. प्रथम आर्य सत्य है- सब्बम दुक्खं -दुःख सर्वत्र व्याप्त  है. बुद्ध ने कहा है, नश्वरता बहुत दुखदाई है. इसे दूर करने के लिए "स्व" भावना को ह्रदय से तिरोहित करने की आवश्यकता है-नेतम मना,नसों हमस्मी, ना मेसो अनाति." 
          बुद्ध ने दूसर आर्य सत्य में बताया कि दुःख के क्या-क्या कारण हैं. यह किन-किन कारणों से उत्पन्न हो कर मानव को किस-किस तरह से उत्पीड़ित करते हैं. मानव की इंद्रियाँ- आँख, कान, नाक, जिह्वा, शरीर और मस्तिष्क सुख पाने की चेष्टा करते-करते, दुःख के सागर में विलीन हो जाते  हैं. मानव की लालसाएं अनंत हो जाती हैं और वह मृत्यु  के बाद मोक्ष पाने की जगह पुन:  जन्म लेने की प्रक्रिया में चला जाता है. दुःख का एक सिलसिला बन जाता है. 
          बुद्ध ने कहा कि दुखों के निवारण का तीसरा आर्य सत्य है, मुक्ति. मुक्ति का मार्ग क्या है ? जन्म-मरण से हम कैसे मुक्ति पा सकते हैं ? मुक्ति के उपाय बताते हुए बुद्ध ने कहा, "जैसे सागर के जल का स्वाद खारा होता है, वैसे ही मेरे धर्म मार्ग का स्वाद मुक्ति है." बुद्ध ने सन्देश दिया," लिप्सा त्याग कर जीवन को मुक्ति प्रदान करो." 
          दुःख निवारण का चौथा आर्य सत्य यह जानने में है कि निवारण का मार्ग क्या है ? बुद्ध का सन्देश है कि अन्धकार में भटकने से अच्छा है कि मानव अपना मार्ग, धर्म से प्रकाशित करे. मानव को बुद्ध के इन आठ सूत्रों को जीवन में उतारना चाहिए- १. सही समझ,२. उत्तम विचार,३. उचित वाणी, ४. उचित क्रियाकलाप,५. उचित रहन-सहन,६. उचित प्रयास,७. उचित मनःस्थिति  और ८. उचित ध्यान. 
          डा. ऊमाचरण  झा की यह पुस्तक नोवेल्टी एंड कम्पनी, पटना द्वारा प्रकाशित है. इस हार्ड बाउंड पुस्तक में २४१ पृष्ठ हैं. पुस्तक का मूल्य है ४५० रुपए है. पुस्तक पठनीय और संग्रहनीय है. 

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

भाजपा के अयोध्यायी तेवर से एनडीए में दरार बढ़ेगी

रांची: झारखण्ड की राजनीति में अयोध्या पर आया न्यायालय का फैसला क्या रंग लाता है, इस पर सरकार के सभी सूचना और अन्वेषण तंत्र काम कर रहे हैं, साथ ही साथ, भाजपा इसे भुनाने की जुगत में भी लगी है. लेकिन उसने अगर झारखण्ड में कोई फिर साम्प्रदाइक  खेल  खेलना शुरू किया तो, उसे सबसे पहले जदयू , झामुमो और आजसू के विरोध का सामना करना पडेगा. 
            अयोध्या फैसले के बाद जदयू के नेता बहुत सचेत हैं. ऐसे भी वे मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा की राजनीति से तिलमिलाए हुए हैं. जदयू का एक भी प्रतिनिधि मुंडा मंत्रिमंडल में नहीं लिया जा रहा है. फिर बिहार में विधान सभा चुनाव में भाजपा की नई रणनिती का भी निर्माण अयोध्या फैसले के आधार पर किया जा रहाहै. 
            नीतीश कुमार ने अपने करीबियों को भाजपा की नई रणनीति पर नजर रखने के लिए लगा दिया  है. नीतीश कुमार को मुसलमानों के वोट का प्रतिशत घटने का भय पहले से ज्यादा हो गया है. वे नरेंद्र मोदी के प्रकोप से ज्यादा बड़ा प्रकोप  भाजपा की नई रणनीति और  उत्साह को मान रहे हैं. कहीं इस फैसले पर अगर भाजपा ने ज्यादा उछल-कूद की तो जदयू का चुनावी समीकरण ही गड़बड़ा जाएगा.
            भाजपा के एक नेता ने भाजपा हाई कमान से कहा है कि इस फैसले के बाद भाजपा को बिहार की सभी सीटों पर चुनाव लड़ना चाहिए. भाजपा चुनाव में अकेली क्लीन स्वीप कर सकती है.  इसकी भनक झारखण्ड जदयू तक पहुंची है. ऐसा प्रतीत होता है कि बिहार चुनाव का दृश्य बदलेगा और उसका पूरा असर झारखण्ड पर भी पडेगा.
            झामुमो को भी मुसलमानों के वोट की सख्त जरूरत है, लेकिन भाजपा के नए अयोध्यायी तेवर से उसके अंदर खलबली मची हुई है. शिबू सोरेन तो शुरू से ही भाजपा से दूरी बनाये रखने के पक्षधर थे , लेकिन पुत्र हट के कारण उनको भाजपा से लिखित माफ़ी भी मांगना पड़ा और मुख्यमंत्री  पद की दावेदारी भी छोडनी पड़ी. वैसे अभी शिबू सोरेन अपने पुत्र हेमंत सोरेन की रजनीति से स्वयं खार खाए हुए हैं. पार्टी पर उनकी पकड़ बहुत कमजोर हो गई है और से इस हालात में अपने को मजबूर पा रहे हैं.         

बुधवार, 29 सितंबर 2010

अर्जुन मुंडा सरकार के पतन की संभावना प्रबल

रांची: मंत्रिमंडल विस्तार के पहले ही अर्जुन मुंडा की सरकार के पतन की संभावना प्रबल हो गई है.
         जिस स्वार्थ और उद्देश्य से इस सरकार का गठन हुआ था, वे  भी समाप्त हो गए हैं. कोड़ा कांड से सम्बंधित जिन साक्ष्यों और फाइलों की मुंडा को तलाश थीं, वे  अब सीबीआई के पास पहुँच गईं हैं. भाजपा और झामुमो के अलावा आजसू में भी हताश छाई हुई है. ज्ञातब्य है की सिबू सोरेन के नेतृत्व वाली सरकार ने न्यायालय में आवेदन दे कर कहा था कि  कोड़ा कांड में  सीबीआई जाँच की जरूरत नहीं है. लेकिन राष्ट्रपति  शासन में कोड़ा कांड की जाँच सीबीआई से शुरू हो गई. जिस भाजपा ने विधान सभा चुनाव के समय कोड़ा कांड की सीबीआई से जाँच की मांग की थी, उसी ने इस कांड की  सीबीआई जांच को रोकने के लिए न्यायालय तक को सोरेन शासन में आवेदन दिया.    
           इतना ही नहीं भाजपा और झामुमो मंत्रियों के नाम भी तय नहीं कर पा रहे हैं, तो ऐसे में  विभाग बांटने की बात ही बेमानी हो गई है. भाजपा में दरकिनार कर दिए गए रघुबर दास और मुंडा से खार खाए सरयू राय ने मुंडा और मधु कोड़ा के कामन मित्रों के खिलाफ अपना अभियान  तेज कर दिया है. सरयू राय ने मधु कोड़ा के निकट सहयोगी विनोद सिन्हा के खिलाफ एक ऋण घोटाले से सम्बंधित मामले पर मुकदमा भी दर्ज कराया है.
          झामुमो में पारिवारिक विवाद भी तेज हो गया है. सिबू न तो अपने पुत्र हेमंत सोरेन से खुश  हैं और न स्वर्गीय दुर्गा सोरेन की पत्नी सीता सोरेन से. इधर मंत्रियों के नाम तय करने के मामले में सिबू सोरेन और हेमंत सोरेन के बीच भी विवाद हो गया है. सिबू सोरेन घोषणा कर रहे हैं कि वे स्वयं मंत्रिओं के नाम तय करेंगे. लेकिन  मंत्रियों के नामों की दूसरी सूची   हेमंत सोरेन तैयार कर रहे हैं. 

        अर्जुन मुंडा  रघुवर दास के समर्थक विधायकों को अगर मंत्रिमंडल से दरकिनार करते हैं  तो, भाजपा में विवाद अपने चरम पर पहुँच जाएगा और रघुवर दास मीडिया के सहयोग से अर्जुन मुंडा की पोल खोलना शुरू कर देंगें. ऐसा  पोल खोला कार्यक्रम पहले भी दास और मुंडा खेल चुके हैं. झारखण्ड की राजनीति में गडकरी के द्वारा प्रताड़ित होने के बाद रघुवर दास लालकृष्ण आडवानी की शरण में बैठे हैं  और उनके दरबार में उनको भरपूर सहयोग मिल रहा है. लालकृष्ण   अडवाणी  मुंडा सरकार के गठन के औचित्य पर सवाल उठा रहे हैं और इस मामले पर पार्टी के कई बड़े नेता उनके साथ हैं. भाजपा के सभी बड़े नेताओं को किनारे कर गडकरी ने मुंडा को सरकार बनाने की अनुमति दे दी. सुषमा  स्वराज तो इस मामले पर बहुत ही खफा हैं. अगर किसी तरह अर्जुन मुंडा मंत्रिमंडल का विस्तार कर भी लेते हैं तब भी उनकी सरकार की उम्र बढ़ती हुई नजर नहीं आती है.
-जिया जैदी

रविवार, 19 सितंबर 2010

थैलीशाहों के कारण बनी झारखण्ड में मुंडा सरकार?

यह  बात अब सामने आ रही है कि थैलीशाह अजय संचेती, तुलसी अग्रवाल और संदीप कालिया ने गडकरी की ओर से झारखण्ड में बीजेपी और जेएमएम  की मिलीजुली  सरकार बनवाने में अहम् भूमिका निभाई. रघुवर दास ने  यह स्वीकार किया है कि  भाजपा विधायक दल के नेता के पद से रघुवर  दास ने तब इस्तीफा देने से इनकार कर दिया था, जब ऐसा करने के लिए अजय संचेती ने उनसे कहा था. लेकिन जब रूस से गडकरी ने रघुवर दास को स्वयं कहा कि वे अर्जुन मुंडा के लिए विधायक दल के नेता पद से इस्तीफा दे दें, तो उन्होंने इस्तीफा दे दिया.

सवाल है की इन थैली शाहों को क्या गरज पड़ी थी कि वे झारखण्ड की राजनीति में इतने  बड़े फैक्टर हो गए कि वे भाजपा विधायक  दल के नेता से इस्तीफा दे देने कि सलाह दे दें, भले वे भाजपा की कार्यकारिणी के सदस्य ही क्यों न हों. इस कार्य में लगे दो अन्य थैलीशाहों का  बार-बार झारखण्ड आना और यहाँ की राजनीति पर हावी होना लोकतंत्र के लिए घातक है  और यह इस बात का संकेत है कि दाल में कुछ काला जरूर है. इसी तरह के एक थैलीशाह के कारण ही अरुण जेटली को भी बहुत अपमान झेलना पड़ा था. लेकिन, झारखण्ड में तो शुरू से भाजपा थैलीशाहों के इशारे पर नाचने वाली पार्टी रही है.
झारखण्ड के अनेक नेता उड़ीसा में अपनी काली कमाई खपाए हुए हैं और तुलसी अग्रवाल  और संदीप कलिया  दोनों ही उड़ीसा के हैं. यह जांच का विषय है कि इन दोनों का क्या अर्जुन मुंडा और मधु कोड़ा दोनों से ही सम्बन्ध है ? कोड़ा ने मुंडा के मुख्यमंत्रित्व काल में ही लूट खसोट की राजनीती शुरू की थी. साथ ही, जब कुछ ही माह पहले, शिबू सोरेन के नेतृत्व में भाजपा-झामुमो की सरकार बनी थी, उस सरकार के सभी घटकों ने एक मत हो कर  कोड़ा लूट कांड में सीबीआई जांच न करवाने  का फैसला किया था. शिबू सरकार ने, तदनुरूप,  न्यायालय में भी जा कर कहा था कि इस कांड में सी बी आई जांच की जरूरत नहीं है. वह तो भला हो कि शिबू की सरकार भाजपा और झामुमो की लड़ाई  में गिर गयी और राष्ट्रपति  शासन  में कोड़ा कांड की जांच सीबीआई को सौंपी गयी. वरना यह मामला तो दब ही जाता. इस मामले के याचिका कर्ता दुर्गा उरांव  को भी इतना डरा  दिया गया था  कि वह कोर्ट में अपनी उपस्थिति नहीं दे रहा था और अंडरग्राउंड हो गया था. झारखण्ड पुलिस ने तो साफ़ कह दिया था कि दुर्गा उरांव नाम का कोई आदमी ही नहीं है. और बाद में सीबीआई ने दुर्गा उरांव को खोज कर न्यायालय में  पेश कर दिया.

दुर्गा उरांव की  घटना भी साबित करती  है कि भाजपा और झामुमो कोड़ा कांड से मधु कोड़ा को बचाना चाहते हैं. सबसे अहम् बात यह भी है कि झारखण्ड विधान सभा  चुनाव के समय तो भाजपा ने कोड़ा कांड की सीबीआई जाँच के लिए आन्दोलन चलाया था, लेकिन, वह तब नरम पड़ गयी जब कांग्रेसी नेताओं ने भाजपा  से कोड़ा कनेक्शन की पोल खोलने की धमकी दे डाली.

मुंडा सरकार बनने से झामुमो सुप्रीमो खुश नहीं हैं. उन्होंने साफ़ शब्दों में कह दिया है कि वह नहीं कह सकते कि मुंडा कि सरकार कितने महीने चलेगी. क्या सरकार जिस 'डील' के आधार पर  बनी है, उसका मुंडा पूरा करने में आना कानी कर रहे हैं ? क्या कारण था कि अर्जुन  मुंडा कुछ ही माह पूर्व तक चाहते थे कि शिबू की झामुमो-भाजपा सरकार जल्दी से गिर जाये ?  दूसरी ओर, सरकार गिरते ही शिबू सोरेन के पुत्र हेमंत सोरेन  ने शिबू सोरेन जैसे कद्दावर नेता से लिखित माफीनामा भाजपा अध्यक्ष को भिजवाया ? क्या मुंडा और हेमंत ने कोई अलग से डील की जिसमे शिबू सोरेन शामिल नहीं हैं?

झारखण्ड के मामले में यशवंत सिन्हा को नजरअंदाज कर गडकरी ने उनको खूब  अपमानित किया है, क्योंकि जिन्ना मामले पर उन्होंने आडवाणी के खिलाफ  बयान देकर आरएसएस की गाँधी विरोधी योजना को नाकाम कर दिया था. आखिर यशवंत सिन्हा समाजवादी हैं और गाँधी के खिलाफ किसी षड्यंत्र में शामिल नहीं होना चाहेंगे. यशवंत जी को उनकी बेबाकी की सजा नागपुर के प्रतिनिधि के रूप में गडकरी ने उनकी अवहेलना कर दी है. और यशवंत सिन्हा ने भी अपनी प्रतिक्रिया  स्पष्ट  रूप से दे दी है कि वे गडकरी से कतई खुश नहीं हैं. कुल मिला कर लगता है कि मुंडा सरकार को लेकर झारखण्ड भाजपा का विवाद और गहराएगा. यह सरकार ज्यादा दिनों तक टिकने वाली नहीं है.

शनिवार, 7 अगस्त 2010

कश्मीर समस्या के लिए भाजपा की साम्प्रदाइक नीति सबसे ज्यादा जिम्मेदार


            कश्मीर में आज जो विकराल समस्या पैदा हुई है, उसके लिए भाजपा की  साम्प्रदाइक नीति सब  से ज्यादा जिम्मेदार है. यह बात सच है कि  पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने घाटी में अपने पैर जमा लिए हैं और वे कश्मीर के  पाकिस्तान के साथ विलय के लिए खुलेआम मांग कर रहे हैं. केंद्र और कश्मीर की सरकार ने सम्मिलितरूप से आतंकवादियों की जड़ हिलाने में सफलता नहीं पाई है. लेकिन,  कश्मीर में आतंकवादियों को पैर जमाने में भाजपा की साम्प्रदाइक नीति सबसे अधिक जिम्मेदार है. संविधान में कश्मीर को दिए गए विशेष दर्जे को समाप्त करने की मांग को लेकर भाजपा, बजरंगदल की कारगुजारियां और दंगे की राजनीति ने कश्मीर के मुसलमानों को  ही नहीं, भारत के अन्य हिस्सों के मुसमानों को भी सशंकित कर दिया है.
           भाजपा ने कश्मीर में और कश्मीर के बहार भी हिन्दू और मुसलमानों के बीच खाई खोदने का कभी कोई अवसर कभी  नहीं छोड़ा है, और अगर अवसर हाथ नहीं आ रहा है तो, उसने  अवसर पैदा किया है. आखिर भाजपा के पूज्य सावरकर ने ही तो भारत विभाजन  की  रूपरेखा अंग्रेजों के साथ मिल कर बनाई थी और उनकी संचालक  संस्था आर. एस. एस. हमेशा से कथित हिन्दू संस्कृति और हिन्दू राष्ट्र की बात गढ़ती रही है. उसने भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति को कभी नहीं स्वीकारा. उसने मनु के  हिन्दू विरोधी ग्रन्थ से कभी अपने को अलग करने कोशिश नहीं की, जिस ग्रन्थ के कारण हिन्दू यानी सनातन धर्म का विनाश हो गया और हिन्दू समाज जाति भेद की बीमारी से आज तक त्रस्त है उससे वह आज तक चिपकी हुई है.
           भाजपा ने देश को हमेशा इमोशनल ब्लैकमेल  किया है. कभी अयोध्या में राम मंदिर बनाने के नाम पर तो कभी ईसाइयों के खिलाफ  हिंसक वारदात कर या वारदात करने वालों  को  समर्थन दे कर. भाजपा की राजनीती कभी  भी रचनात्मक नहीं रही है. अयोध्या में मस्जिद को गिराने में भाजपा और बजरंगदल का कितना हाथ है, यह किसी से छिपा नहीं है.खैर, इस पर न्यायालय विचार कर रहा है. लेकिन मुजरिमों को सबने टेलीविजन अपनी आँखों से देखा है. न्यालय की प्रक्रिया लम्बी चलती है और इसी का फायदा भाजपा और उसके आका संगठन आर.एस.एस. हेशा उठाते रहे हैं. भारत आतंरिक और जातीय एकता तो तोड़ने में भाजपा की स्पष्ट भूमिका रही है.
         जो दल राष्ट्रवाद की बात करती है, उसे तो देश की एकता को और मजबूत करने वाली नीति अपनानी चाहिए थी, लेकिन उसकी नीति पूर्ण रूप से कट्टरवादी है जो लोकतंत्र कि स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक है. अनेक  बार अयोद्या के नाम पर या राम के नाम पर उसने आम जनता को ठगा है. रामायण के हर कांड में आदर्श  है, जबकि भाजपा ने जितने भी कांड किये हैं, उनमें आदर्श की बात सोची ही नहीं जा सकती है! उसे इस बात का अहसाह है कि  बिना भावना भड़काए वह चुनाव में विजय हासिल  नहीं कर सकती है.इसी अहसास के कारण,  पिछले कुछ चुनावों में उसने बार-बार राम मंदिर के मामले को गर्माने की कोशिश की.  उसकी इस नीति पर उसके ही दल के नेता और पत्रकार अरुण शौरी ने कहा था-"किसी  कारतूस का दुबारा प्रयोग नहीं किया जा सकता है." लेकिन गडकरी इस मुद्दे को फिर उठाने की बात कर रहे हैं. एक बार अडवाणी की घोर साम्प्रदाइक रथ यात्रा ने देश की साम्प्रदाइक एकता को तार तार कर दिया था लिकिन अब ऐसा प्रतीत हॉट है कि आज का युवा वर्ग भाजपा कि नीति में कतई विश्वास नहीं रखता हैं. लेकिन इस प्रचारवादी पार्टी को भावना भड़काने के अनेक तौर तरीके आते हैं. इस लिए उसकी नीति से देश को हर मोड़ पद हानि उठानी पद सकती है.